दर्द की कंबल ओढ़े,
रोक रहें है रूह को,
रात फिर से चढ़ आई...
नींद आखों में पिघलीही नहीं,
की मिटते अंदेशों की मायूस सिसकीयां,
नींद आखों में पिघलीही नहीं,
की मिटते अंदेशों की मायूस सिसकीयां,
उमड़ के आ रही है बार बार...
सपनों के सरसराहते परदे, रोक रहें है रूह को,
इन बेशुमार सन्नाटो में घुल जाने से...
तेरी खुशमिजाज बातों का,
हर लब्ज़ सच्चा था...
तुमने तो कहां था की,
ये मासूम महल्ले हटकर,
एक शहर बसने वाला था यहांपे...
उसका ठिकाना तो नहीं पर,
एक झील,
जो यहांसे गुझर जाया करती थी
उसी जगह पे एक चौराहा बन गया है, जहांसे, बेहोशी के सैलाब बहां करते है…
वही जगह तुम्हे भुलाने के लिए
सेहबत होगी...
आजकल इस भीड़ से प्यार होने लगा है...