Wednesday, July 23, 2014

हिसाब

पता नहीं क्यों,
पर तेरे जाने के बाद,
फिरसे ये देहलीजें
मैं कभी बांध ही ना पाया...

वो नीला फरिश्ता,
जिसकी आमद का इंतज़ार करते हुए
अरसे गुज़र गये, वो आयां ही नहीं तो ?
इन दोनों जहाँनो को जोड़ती हुईं
रोशनी की ये लकीरे,
उनकी तेजी तो बदकरार है,
पर मांद लग रही है कुछ आजकल,
ये धुंद जो आँखों पर छाई है…

फिर सोचता हूँ,
ठीक ही हुवा की ये बह गयी,
कच्ची मिट्टी की तो बनी थी
 
उस पल महसूस नहीं हुवा,
पर आज तुम्हें बतां ही दूँ
की गुलाब का वो पौधा
जो तुम्ही ने लगाया था
वो भी चला गया है दहलीज के साथ
और भी कई गुज़री चीजों के हिसाब बाकी हैं
पर खैर, ये अलमारी तो है,
तेरे  आने के कई सावन छुपाएँ है मैंने उसमें

Thursday, July 17, 2014

वज़ूद

सर्द हवा के झोकों से,
लदा सा ये आसमान...
थकी हुई सी यें सांसे,
आफताब तक फ़ैली हुई,
ये बेअंजाम कायनाते,
ये सभी...
पुंछ रहे है कुछ,

उफ़क़ के इन गहरे सन्नाटों से
जमीं पर रेंगती हुए इन हसरतों से
उन सपनों से...
जो कभी इन्ही लोगों ने देखे थे...
इनके बस्तीयों की बेजान रोशनी
छूपा रही है अपने ही वज़ूद को

(Thanks Sammati, for helping me out with the title)