Thursday, July 17, 2014

वज़ूद

सर्द हवा के झोकों से,
लदा सा ये आसमान...
थकी हुई सी यें सांसे,
आफताब तक फ़ैली हुई,
ये बेअंजाम कायनाते,
ये सभी...
पुंछ रहे है कुछ,

उफ़क़ के इन गहरे सन्नाटों से
जमीं पर रेंगती हुए इन हसरतों से
उन सपनों से...
जो कभी इन्ही लोगों ने देखे थे...
इनके बस्तीयों की बेजान रोशनी
छूपा रही है अपने ही वज़ूद को

(Thanks Sammati, for helping me out with the title)

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