पता नहीं क्यों,
पर तेरे जाने के बाद,
फिरसे ये देहलीजें पर तेरे जाने के बाद,
मैं कभी बांध ही ना पाया...
वो नीला फरिश्ता,
जिसकी आमद का इंतज़ार करते हुए
अरसे गुज़र गये, वो आयां ही नहीं तो ?
रोशनी की ये लकीरे,
उनकी तेजी तो बदकरार है,
ये धुंद जो आँखों पर छाई है…
फिर सोचता हूँ,
ठीक ही हुवा की ये बह गयी,
कच्ची मिट्टी की तो बनी थी
उस पल महसूस नहीं हुवा,
पर आज तुम्हें बतां ही दूँ
की गुलाब का वो पौधा
जो तुम्ही ने लगाया था
वो भी चला गया है दहलीज के साथ
और भी कई गुज़री चीजों के हिसाब बाकी हैं
पर खैर, ये अलमारी तो है, तेरे आने के कई सावन छुपाएँ है मैंने उसमें
वाह! क्या बात हैं!
ReplyDeleteसायबा, नेमानं लिहीत जा वा, आम्हाला आवडेल वाचायला ।